बारूद के ढेर पर रखा है जहां सारा|
डर-डर के जीता है इंसान बेचारा ||
खुदा ने बक्शी थी कायनात प्यारी-प्यारी|
ज़माने ने खीच दी सरहद न्यारी-न्यारी ||
सरहद की लड़ाई में हो गए कई कुर्बान|
फिर भी न आया नतीजा-अ-फरमान ||
बाज़ारों में महंगे होने लगे है कफ़न|
और कई लाशें करनी है दफ़न||
जाने क्या चाहते है वो नापाक मन |
क्यों बने बैठे है इंसानियत के दुश्मन ||
बेगाने भी नहीं करते ऐसे सितम|
जो अपनों ने ही दे दिए जख्म ||
देखना चाहते है हम वो ख़ूबसूरत मंजर|
खिल उठे ये बेजान ज़मी बंजर ||
ख़ुशी से मने हर और दिवाली |
ईद पर हो हर और खुशहाली |
बैसाखी पर हो चारों और हरियाली|
और क्रिसमस पर नाचे दुनिया सारी||
उस दिन की तलाश है हमे |
होंसला है तो आस है हमे ||
क्योकि बच्चा-बच्चा घूम रहा है मारा-मारा|
बारूद के ढेर पर रखा है जहां सारा ||
डर-डर के जीता है इंसान बेचारा |
बारूद के ढेर पर रखा है जहाँ सारा||
Sunday, November 22, 2009
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