मैं बर्बाद-ऐ-गुलिस्तां का सूखा झाड़ हूँ...
कल तक तो मैं आबाद था, पर अब बर्बाद हूँ....
तोता-मैना मिला करते थे मेरी डाल पर...
खिल जाता था मेरा चेहरा मोर की आवाज पर...
बारिश की बूँदें मुझे छेड़-छेड़ कर जाती थीं...
खूबसूरत कलियाँ मुझ पर भी खिल आती थीं...
लेकिन फिर चला आया खिज़ा का मौसम...
हो गईं इक दिन आँखें मेरी भी नम...
चारों तरफ नज़र आ रहा था पतझड़...
लग रहा था आने वाले दिनों से मुझे डर...
मेरे अरमान बिखर गए पत्तों की तरह...
पंछी भी उड़ गए बेगानों की तरह...
पहले मै लेह-लद्दाख था, अब तो बग़दाद हूँ...
मै बर्बाद-ऐ-गुलिस्तां का सूखा झाड़ हूँ...
एक बार फिर एक दिन सावन का वो कल आएगा...
उस पल के लिए मैं बेकरार हूँ...
पहले मैं आबाद था, अब बर्बाद हूँ...
मैं बर्बाद-ऐ-गुलिस्तां का सूखा झाड़ हूँ...
-खेम (k.c.)
Thursday, October 22, 2009
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bahut badhiya likha hain
ReplyDeletehttp/jyotishkishore.blogspot.com
vo kal jaroor aayega.
ReplyDeleteचिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. मेरी शुभकामनाएं.
ReplyDelete---
हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]
हिंदी ब्लॉग परिवार में आपका स्वागत है!लिखते रहिये और पढ़ते रहिये....
ReplyDeleteइतनी नकारात्मकता क्या अच्छी है ... लेकिन कविता अच्छी है... ये (तो, मैं) से बचना चाहिए ...
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